दिल्ली के झरोखे से: डा. दर्शन सिंह हरविन्दर
दिल्ली नगर निगम को पूरी तरह कन्ट्रोल में करने के लिए ज्यादा अध्किारों की मांग कर रही दिल्ली सरकार को केन्द्र द्वारा झटका देते हुए यह सपष्ट कर देने के बावजूद कि वह निगम के बारे ज्यादा अध्किार देने को तैयार नहीं है, निगम को पूर्ण तौर पर अपने अध्ीन लाने के लिए मुख्य मंत्री शीला दीक्षित पुनः सक्रिय है।
निगम की चाहत में शीला सरकार ने नया पैंतड़ा अपनाते हुए इस मकसद के लिए अब स्वयं ही नए कानून का ड्रापफट बनाने का निर्णय लिया है। सरकार का मानना है कि संविधन की राज सूची के तहत उसे यह अध्किार है कि वह कार्पोरेशन के लिए कानून बना सके। इसके तहत निगम को ‘टेक ओवर’ करने की कवायद तेज करते हुए मुख्य मंत्री द्वारा दिल्ली के मुख्य सचिव की अगवाई में एक समिति का गठन हो चुका है। इस समिति की रिपोर्ट के बाद दिल्ली सरकार नया एक्ट बना कर उसे केन्द्र के पास भेजेगी और अगर उसे केन्द्र द्वारा स्वीकृति मिल गई तो वह मौजूदा डी एम सी एक्ट का स्थान ले लेगा।
मुख्य मंत्री खेमे का तर्क है कि एम सी डी एक्ट जो 1957 में बना था से आज तक 50 वर्ष से भी ज्यादा समय बीत जाने पर हालात कापफी बदल चुके हैं। सन् 1957 में दिल्ली के हालात कुछ और थे और मौजूदा एैक्ट उसी के आधर पर बना था, इसलिए इसमें संशोध्न करना बहुत आवश्यक है। निगम एैक्ट में कई खामीयां भी हैं जिन्हें दूर किया जाना समय की जरूरत है। इस एैक्ट के कारण कई बार तो विरोधभासी पफैसले तक हो जाते हैं।
दिल्ली सरकार का मानना है कि संविधन के तहत उसे यह अध्किार है कि वह नगर निगम के लिए नियम बना सके। इसी वजह से नया एैक्ट बनाने के इरादे के साथ दिल्ली सरकार ने इस समिति का गठन किया है। यह बात अलग है कि दिल्ली सरकार दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा न मिल सकने के कारण ‘अपाहिज’ होने के कारण निगम के लिए बेशक एैक्ट तो बना सकती है जिसे विधनसभा में पास करवा कर केन्द्र सरकार के पास भेजा जाएगा, परन्तु यह कड़वा सच्च है कि तकनीकी तौर पर यह बिल पेश करने से पहले केन्द्र की स्वीकृति लेनी होगी। यदि ‘हवा का रूख सही रहा’ तो इसके बाद दिल्ली सरकार को कार्पोरेशन के कन्ट्रोल के लिए केन्द्र सरकार से अध्किार मांगने की जरूरत ही नहीं पड़नी।
दरअसल मुख्य मंत्री शीला दीक्षित यत्नशील है कि निगम मुकम्मल तौर पर दिल्ली सरकार के अध्ीन हो और एैक्ट में जहां जहां उप-राज्यपाल का नाम है, उसके स्थान पर दिल्ली सरकार हो। कमिश्नर की नियुक्ति करने, कार्पोरेशन वार्डो व जोन का पुर्नगठन, वित्तीय और नीतिगत निर्णय लेने का अध्किार भी राज्य सरकार को मिलना चाहिए।
मुख्य मंत्री का कहना है कि सरकार निगम के अध्किार को छीनना नहीं चाहती । सिपर्फ सरकार के प्रति जवाबदेह बनाना चाहती है क्योंकि काम काज में दो स्तरीय प्रणाली पिफट नहीं बैठ रही। दिलचस्प यह है कि यह सिरायत का जलवा ही समझें। आखिर पिछले तीन वर्षो से दिल्ली सरकार व नगर निगम में अंदर ही अंदर सुलग रही चिंगारी सरकार द्वारा निगम को ‘संभाल’ लेने के मन्सूबों के कारण भड़की हुई है क्योंकि तीन वर्ष पहले जब निगम में कांग्रेस काबिज थी जब दिल्ली सरकार को यह मांग उठाने का ख्याल नहीं आया और दो वर्ष पहले ही निगम से सत्त छिन जाने पर यह मांग उठाई जाने लग पड़ी। याद रहे निगम पर इस समय भारतीय जनता पार्टी काबिज है।
जापान की राजधनी टोकियो के बाद विश्व के दूसरे सबसे बड़े दिल्ली नगर निगम जो 7 अप्रैल 1958 को संसद द्वारा एैक्ट के जरिए होंद में आया था, का वार्षिक बजट 6000 करोड़ के करीब है। तकरीबन 96 पफीसदी आबादी कवर कर रही निगम मातहत 1 लाख 29 हजार के लगभग सपफाई कर्मचारी मौजूद हैं। यह बात अलग है कि आध्े कर्मचारी काम पर न होने के कारण देश की राजधनी दिल्ली की सपफाई किसी से छुपी नहीं, जबकि वह दरोगों केे साथ सांठ गांठ करके घर बैठे वेतन का लुत्पफ लेते हैं। निगम के आध दर्जन बड़े अस्पताल व सैंकड़े डिस्पैंसरियां होने के बावजूद वह स्वयं ‘बीमार’ हैं।
यहां पर ही बस नहीं, यह भी पता चला है कि दिल्ली के अंदर 18 हजार पार्को में से 14,636 पार्क निगम के मातहत हैं जिनका वार्षिक बजट 200 करोड़ रूपए होने कारण ज्यादातर की हालत बदतर है। इसी तरह शिक्षा विभाग का वार्षिक बजट 1100 करोड़ रूपए होने के बावजूद निगम अध्ीन चल रहे 1790 स्कूलों का हाल भी बदतर ही है। और दिल्ली की 30,600 किलामीटर लम्बी सड़कों में से 27000 किलोमीटर निगम अध्ीन होने के कारण न केवल इस महकमें में भृष्टाचार है बल्कि इसका बिल्डिंग विभाग इस मामले में इसका भी बाप है।
काबिले गौर है कि पिछले वर्ष सितम्बर से ही कार्पोरेशन से जुड़े अध्किारों को लेकर केन्द्र व दिल्ली सरकार में रस्साकशी होती आ रही है। पहले केन्द्र सरकार ने निगम से जुड़े 23 अनुच्छेदों के तहत दिल्ली सरकार को अध्किार देने की पेशकश की थी, परन्तु बाद में अध्किारों की संख्या 23 से घटा कर 17 कर दी गई। परन्तु दिल्ली सरकार इन आध्े अध्ूरे अध्किारों से संतुष्ट नहीं और इसी कारण उसने ये अध्किार अब तक स्वीकार नहीं किए। इसी को लेकर केन्द्र व राज्य सरकार दरमयान खींचतान चल रही है।
इसलिए सरकार ने अगर वाक्य ही दिल्ली के कुछ करना है तो दिल्ली सरकार पुलिस, डी डी ए, कार्पोरेशन निगम आदि को अपने मातहत लाने की मांग करने की बजाए अगर दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने में योगदान डाल दे तो ये सारी मांगें अपने आप पूरी हो जाएंगी। वह भी तब जब केन्द्र में लगातार दूसरी और दिल्ली में कांग्रेस की ही लगातार तीसरी बार हकूमत चल रही हो।
